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कामिका एकादशी व्रत कथा || Kamika Ekadashi Vrat Katha // श्रावण कृष्ण एकादशी // Shravan Krishna Ekadashi Vrat Katha

कामिका एकादशी व्रत कथा || Kamika Ekadashi Vrat Katha // श्रावण कृष्ण एकादशी // Shravan Krishna Ekadashi Vrat Katha  हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। श्रावण मास की कृष्ण एकादशी का नाम कामिका है। उसके सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। कामिका एकादशी व्रत कथा || Kamika Ekadashi Vrat Katha  कुंतीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन, आषाढ़ शुक्ल देवशयनी एकादशी तथा चातुर्मास्य माहात्म्य मैंने भली प्रकार से सुना। अब कृपा करके श्रावण कृष्ण एकादशी का क्या नाम है, सो बताइए। श्रीकृष्ण भगवान कहने लगे कि हे युधिष्ठिर! इस एकादशी की कथा एक समय स्वयं ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद से कही थी, वही मैं तुमसे कहता हूँ। नारदजी ने ब्रह्माजी से पूछा था कि हे पितामह! श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनने की मेरी इच्छा है, उसका क्या नाम है? क्या विधि है और उसका माहात्म्य क्या है, सो कृपा करके कहिए। नारदजी के ये वचन सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- हे नारद! ...

धोली सती की स्तुति || धोली सती चालीसा || Dholi Sati Ki Stuti || Dholi Sati Ki Chalisa || Dholi Sati Ka Itihas Lyrics in Hindi

धोली सती की स्तुति || धोली सती चालीसा || Dholi Sati Ki Stuti || Dholi Sati Ki Chalisa || Dholi Sati Ka Itihas  धोली सती मंदिर-फतेहपुर अग्रसेनजी ने 18 राज्यों को मिला कर गणराज्य बनाया था। उन्होने गौड़ ब्राहमणों को अपना पुरोहित बनाया। उनके आदेश पर 18 यज्ञो का आयोजन किया गया और इनमें अलग-अलग पशुओं की बली दी गई। जब अठारहवें यज्ञ में बली का समय आया तो अग्रसेनजी निरीह पशुओं की बली देख कर करूणा से भर गये और उन्होने बली देने से मना कर दिया। जिसके दंड़ के परिणाम स्वरूप उन्होने क्षत्रिय धर्म छोड़ कर वैश्य धर्म अपनाना पड़ा, जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार किया और अपने राज्य में अहिंसा और शाकाहारी होने का नियम बना दिया। 18 यज्ञो कराने वाले पुरोहितों के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना कर के उन्होने अपने गणराज्य के 18 प्रतिनिधियों को एक-एक गोत्र दे कर सम्मानित किया। अब एक गोत्र वाले अपने गोत्र में विवाह नहीं कर सकते थे। वे दूसरे गोत्र में ही शादी कर सकते थे। अठारह प्रतिनिधियों में से एक थे नारनौंद के राजा बुधमानजी जिन्होने बिंदल गोत्र को चलाया। धोली सती के जीवन के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं हैं। जो...

जय जय जय मात ब्रह्माणी भक्ति मुक्ति विश्व कल्याणी| श्री ब्रह्माणी चालीसा | Shri Brahmani Chalisa Lyrics in Hindi

जय जय जय मात ब्रह्माणी भक्ति मुक्ति विश्व कल्याणी| श्री ब्रह्माणी चालीसा | Shri Brahmani Chalisa Lyrics in Hindi  श्री ब्रहमाणी माताजी का मंदिर-पल्लू राजस्थान राज्य के हनुमानगढ़ जिले का कस्बां पल्लू ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। इसकी भौगोलिक स्थिति बाड़मेर, जैसलमेर और चुरू की तरह हैं। इस गाँव के चारों ओर थार मरुस्थल हैं, आस पास कहीं भी पहाड़ नहीं हैं। गांव में मध्य युग से पूर्व चूने का एक किला था। इसका निर्माण तीन चरण में हुआ। कस्बे में माता ब्रह्माणी, सरस्वती व महाकाली का मंदिर है। ये पुराने किले की थेहड़ पर बना है। माता की दूर-दूर तक मान्यता है। वर्ष भर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंदिर में स्थापित मूर्तियों पर जैन सभ्यता की छाप स्पष्ट दिखाई पड़ती है। बताया जाता है कि हजारों वर्ष पूर्व गीगासर (बीकानेर) के भोजराज सिंह यहां अपना घोड़ा खोजते हुए आए थे। रात हो जाने के कारण वे यहां विश्राम करने एक पेड़ के नीचे रुक गए। उन्हें रात्रि में माता ने दर्शन देकर पूजा करने को कहा। भोजराज सिंह ने सुबह उठकर देखा तो मां ब्रह्माणी, सरस्वती और काली की मूर्तियां जमीन से निकली हुई दिखा...

विजया पार्वती व्रत की पौराणिक कथा || Shri Vijaya Parvati Vrat Katha || Vrat Katha || Shiv Shankar Mata Parvati Vrat Katha Lyrics in Hindi

विजया पार्वती व्रत की पौराणिक कथा || Shri Vijaya Parvati Vrat Katha || Vrat Katha || Shiv Shankar Mata Parvati Vrat Katha विजया पार्वती व्रत की पौराणिक कथा भगवान शिव शंकर भोले नाथ एवं माता पार्वती की कृपा प्राप्‍त कराने वाला यह महान व्रत आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन किया जाता है। इस दिन प्रात:काल उठकर शान्‍तचित्‍त से नित्‍य‍क्रिया से निवृत्‍त होकर स्‍नानादि करके स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण कर विधिवत भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा करने का विधान है।  व्रत कथा  विजया पार्वती व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार किसी समय कौडिण्‍य नगर में वामन नाम का एक योग्य ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सत्या था। उनके घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनके यहां सन्‍तान नहीं होने से वे बहुत दुखी रहते थे। एक दिन नारदजी उनके घर पधारे। उन्होंने नारद मुनि की खूब सेवा की और अपनी समस्या का समाधान पूछा। तब नारदजी ने उन्हें बताया कि तुम्हारे नगर के बाहर जो वन है, उसके दक्षिणी भाग में बिल्व (बेल) वृक्ष के नीचे भगवान शिव, माता पार्वती के साथ लिंगरूप में विराजित हैं। उनकी पूजा करने से तुम्हारी मनोकामना...

Katha Prasang 001 || कथा प्रसंग 001 || जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे || Jo karte Rahoge Bhajan Dhire Dhire

Katha Prasang 001 ||  कथा प्रसंग 001 || जो करते रहोगे  भजन धीरे धीरे || Jo karte Rahoge Bhajan Dhire Dhire  एक बार की बात है। देवर्षि नारद जी भगवान श्रीहरि विष्‍णु जी से मिलने जा रहे थे। तभी उन्‍होंने मार्ग में देखा कि एक तपस्‍वी एक नीम के पेड के नीचे बैठ कर घोर तपस्‍या कर रहे हैं। नारद जी को विचार आया कि जाकर इनसे मिलना चाहिए। नारद जी तपस्‍वी के पास गये और बताया कि वे श्रीहरि विष्‍णुजी से मिलने जा रहे हैं। नारद जी ने यह भी कहा कि अगर आप कोई सन्‍देश प्रभु श्रीहरि विष्‍णु जी तक पहुँचाना चाहतें हों तो मैं उसे उन तक पहुँचा सकता हूँ। इस पर उन तपस्‍वी ने कहा कि आपकी अत्‍यन्‍त कृपा आज मुझ पर हुई है। आप केवल मेरे एक प्रश्‍न का उत्‍तर श्रीहरि विष्‍णु जी से पूछ कर आइयेगा। नारद जी ने कहा पूँछिये आपका प्रश्‍न क्‍या है। तपस्‍वी ने कहा कि आप उनसे केवल इतना पूँछ कर आइयेगा कि मुझे वे दर्शन कब देंगे। नारद जी नारायण नारायण जपते हुए श्री हरि विष्‍णु जी के श्रीधाम में पहुँचे और उनकी स्‍तुति करके सारा वृतान्‍त कह सुनाया। नारद जी ने तपस्‍वी के प्रश्‍न का उत्‍तर जानने की जिज्ञासा प्रकट की। इस ...