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Kanya Sankranti 2025: कन्या संक्रांति व्रत कथा, पूजा विधि, दान का महत्व और लाभ

Kanya Sankranti: कन्या संक्रांति के दिन इस कथा का करें पाठ, सूर्यदेव की बनी रहेगी कृपा! ** ** कन्‍या संक्रांति का परिचय (Kanya Sankranti Kya Hai) ** सनातन धर्म में सूर्य देव का विशेष महत्व है। जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, उस दिन को संक्रांति (Sankranti) कहा जाता है। वर्ष भर में कुल 12 संक्रांतियां होती हैं और प्रत्येक का अपना आध्यात्मिक व धार्मिक महत्व है। ** कन्या संक्रांति (Kanya Sankranti) तब होती है जब सूर्य कन्या राशि (Virgo) में प्रवेश करते हैं। ज्योतिष शास्त्र में इसे बेहद पवित्र और शुभ दिन माना गया है। इस दिन सूर्य देव की उपासना, व्रत, कथा पाठ और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि, संतान सुख और परिवार में खुशहाली आती है। ** कन्या संक्रांति पूजा विधि (Kanya Sankranti Ki Pooja Vidhi) ** कन्या संक्रांति के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद निम्नलिखित विधि से पूजा करने का विधान है – 1. स्नान और अर्घ्यदान – तांबे के लोटे में जल, लाल पुष्प, गुड़...

Ravivar Vrat || रविवार व्रत का महत्‍त्‍व || Ravivar Vrat ka Mahattva|| कैसे करें पूजा || Ravivar Puja Vrat Katha|| Surya Gayatri || lSurya yantra || सूर्यदेव की आरती एवं व्रतकथा का फल जय जय जय रविदेव भक्‍त बुढि़या की कहानी

Ravivar Vrat || रविवार व्रत का महत्‍त्‍व || Ravivar Vrat ka Mahattva|| कैसे करें पूजा || Ravivar Puja Vrat Katha|| Surya Gayatri || lSurya yantra || सूर्यदेव की आरती एवं व्रतकथा का फल जय जय जय रविदेव भक्‍त बुढि़या की कहानी रविवार के दिन सूर्य देव की पूजा का विधान है। यह व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि, धन-संपत्ति और शत्रुओं से सुरक्षा मिलती है। सूर्यदेव का को प्रसन्‍न करने के लिए रविवार का व्रत करने व कथा सुनने से भक्‍तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं साथ ही मान-सम्मान, धन-यश तथा उत्तम स्वास्थ्य मिलता है। रविवार व्रत की पूजन विधि :- ** यह व्रत व्रत एक वर्ष या 30 रविवारों तक अथवा 12 रविवारों तक करने का संकल्‍प लेकर प्रारम्‍भ करना चाहिए।  ** रविवार को सूर्योदय से पूर्व बिस्तर से उठकर शौच व स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ लाल रंग के वस्त्र धारण करना चाहिए। **  इसके बाद किसी पवित्र एवं स्‍वच्‍छ स्थान पर भगवान सूर्य की स्वर्ण निर्मित मूर्ति या चित्र स्थापित करें। घर में एक स्‍थान ऐसा बना लें जहॉं स्‍वच्‍छता हो और नियमित पूजा की जा सकती हो। **  इसके बाद विधि-विधान से धूप, द...

आरती श्री सूर्यदेव जी की Aarti Shri Surya Dev Ji Ki

आरती श्री सूर्यदेव जी की Aarti Shri Surya Dev Ji Ki जय जय जय रविदेव,  जय जय जय रविदेव। ** राजनीति मदहारी  शतदल जीवन दाता। ** षटपद मन मुदकारी  हे दिनमणि ताता। ** जग के हे रविदेव,  जय जय जय रविदेव। ** नभमंडल के वासी  ज्योति प्रकाशक देवा। ** निज जनहित सुखसारी  तेरी हम सब सेवा। ** करते हैं रवि देव,  जय जय जय रविदेव। ** कनक बदनमन मोहित  रुचिर प्रभा प्यारी। ** हे सुरवर रविदेव,  जय जय जय रविदेव।। ** श्री सूर्य चालीसा के लिए यहां क्लिक कीजिए चित्र  desicomments.com  से साभार

श्री सूर्य चालीसा Shri Surya Chalisa || कनक बदन कुण्डल मकर || Kanak Badan Kundal Makar || जय सविता जय जयति दिवाकर || Jay Savita Jay Jayati Diwakar

श्री सूर्य चालीसा Shri Surya Chalisa || कनक बदन कुण्डल मकर || Kanak Badan Kundal Makar || जय सविता जय जयति दिवाकर || Jay Savita Jay Jayati Diwakar दोहा कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अंग। पद्मासन स्थित ध्याइये, शंख चक्र के संग।। चौपाई जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर। भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर। विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन। अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते। सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि। अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढि़ रथ पर। मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी। उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते। मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता, सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि, आदित्य, नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै। द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै। चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै। नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह। सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई। ...