सोमवार, 16 मार्च 2026

श्री बालाजी चालीसा - संपूर्ण संग्रह | Shri Balaji Chalisa | Shri Balaji Chalisa with Lyrics _ मेहंदीपुर बालाजी की चालीसा _

॥ दोहा ॥
श्री गुरु चरण चितलाय,
के धरें ध्यान हनुमान।
बालाजी चालीसा लिखे,
दास स्नेही कल्याण॥
विश्व विदित वर दानी,
संकट हरण हनुमान।
मैंहदीपुर में प्रगट भये,
बालाजी भगवान॥
**
॥ चौपाई ॥
**
जय हनुमान बालाजी देवा।
प्रगट भये यहां तीनों देवा॥
*
प्रेतराज भैरव बलवाना।
कोतवाल कप्तानी हनुमाना॥
*
मैंहदीपुर अवतार लिया है।
भक्तों का उद्धार किया है॥
*
बालरूप प्रगटे हैं यहां पर।
संकट वाले आते जहाँ पर॥
*
डाकनि शाकनि अरु जिन्दनीं।
मशान चुड़ैल भूत भूतनीं॥
*
जाके भय ते सब भाग जाते।
स्याने भोपे यहाँ घबराते॥
*
चौकी बन्धन सब कट जाते।
दूत मिले आनन्द मनाते॥
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सच्चा है दरबार तिहारा।
शरण पड़े सुख पावे भारा॥
*
रूप तेज बल अतुलित धामा।
सन्मुख जिनके सिय रामा॥
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कनक मुकुट मणि तेज प्रकाशा।
सबकी होवत पूर्ण आशा॥
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महन्त गणेशपुरी गुणीले।
भये सुसेवक राम रंगीले॥
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अद्भुत कला दिखाई कैसी।
कलयुग ज्योति जलाई जैसी॥
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ऊँची ध्वजा पताका नभ में।
स्वर्ण कलश हैं उन्नत जग में॥
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धर्म सत्य का डंका बाजे।
सियाराम जय शंकर राजे॥
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आन फिराया मुगदर घोटा।
भूत जिन्द पर पड़ते सोटा॥
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राम लक्ष्मन सिय हृदय कल्याणा।
बाल रूप प्रगटे हनुमाना॥
*
जय हनुमन्त हठीले देवा।
पुरी परिवार करत हैं सेवा॥
*
लड्डू चूरमा मिश्री मेवा।
अर्जी दरखास्त लगाऊ देवा॥
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दया करे सब विधि बालाजी।
संकट हरण प्रगटे बालाजी॥
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जय बाबा की जन जन ऊचारे।
कोटिक जन तेरे आये द्वारे॥
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बाल समय रवि भक्षहि लीन्हा।
तिमिर मय जग कीन्हो तीन्हा॥
*
देवन विनती की अति भारी।
छाँड़ दियो रवि कष्ट निहारी॥
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लांघि उदधि सिया सुधि लाये।
लक्ष्मन हित संजीवन लाये॥
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रामानुज प्राण दिवाकर।
शंकर सुवन माँ अंजनी चाकर॥
*
केशरी नन्दन दुख भव भंजन।
रामानन्द सदा सुख सन्दन॥
*
सिया राम के प्राण पियारे।
जब बाबा की भक्त ऊचारे॥
*
संकट दुख भंजन भगवाना।
दया करहु हे कृपा निधाना॥
*
सुमर बाल रूप कल्याणा।
करे मनोरथ पूर्ण कामा॥
*
अष्ट सिद्धि नव निधि दातारी।
भक्त जन आवे बहु भारी॥
*
मेवा अरु मिष्ठान प्रवीना।
भैंट चढ़ावें धनि अरु दीना॥
*
नृत्य करे नित न्यारे न्यारे।
रिद्धि सिद्धियां जाके द्वारे॥
*
अर्जी का आदेश मिलते ही।
भैरव भूत पकड़ते तबही॥
*
कोतवाल कप्तान कृपाणी।
प्रेतराज संकट कल्याणी॥
*
चौकी बन्धन कटते भाई।
जो जन करते हैं सेवकाई॥
*
रामदास बाल भगवन्ता।
मैंहदीपुर प्रगटे हनुमन्ता॥
*
जो जन बालाजी में आते।
जन्म जन्म के पाप नशाते॥
*
जल पावन लेकर घर जाते।
निर्मल हो आनन्द मनाते॥
*
क्रूर कठिन संकट भग जावे।
सत्य धर्म पथ राह दिखावे॥
*
जो सत पाठ करे चालीसा।
तापर प्रसन्न होय बागीसा॥
*
कल्याण स्नेही, स्नेह से गावे।
सुख समृद्धि रिद्धि सिद्धि पावे॥
*
॥ दोहा ॥
*
मन्द बुद्धि मम जानके,
क्षमा करो गुणखान।
संकट मोचन क्षमहु मम,
दास स्नेही कल्याण॥
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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

जय जगदीश हरे आरती — अर्थ, इतिहास, विधि एवं आध्यात्मिक महत्व | Aarti Lyrics in Hindi and English

जानिए “जय जगदीश हरे” आरती का भाव, प्रसार और कैसे यह भक्ति जीवन में शांति एवं समृद्धि ला सकती है। जरूर पढ़ें
*
“जय जगदीश हरे” आरती हिंदू भक्ति परंपरा की अत्यंत प्रसिद्ध आरतियों में से एक है। यह आरती भगवान विष्णु / जगदीश को समर्पित है और प्रायः प्रातः और संध्या समय पूजा आयोजन में पाठ की जाती है। आरती के मूल भाव है — प्रभु की स्तुति, आश्रय प्रार्थना, भक्त की अनुग्रह याचना। यह आरती ईश्वर को अनादि, अनंत, अविनाशी, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी मानते हुए स्तुति करती है। भक्त स्वयम् को पापी, कलुषित एवं छोटा मानता है और ईश्वर से दया, आश्रय एवं मोक्ष की याचना करता है। यह आरती हमारे देश में सबसे अधिक गायी जाने वाली आरतियों में गिनी जाती है। मंदिरों, घरों, भजन मंडली और धार्मिक आयोजनों में इसे संध्या और आरती समय नियमित रूप से गाया जाता है। इसके भाव एवं सरलता से यह आम भक्तों तक भी पहुँची। यह भजन गीतप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित पुस्‍तक भजन संग्रह (पॉंचवाँ भाग) पत्र पुष्‍प से लिया गया है। इस हेतु हम पुस्‍तक के सम्‍पादक, प्रकाशक एवं लेखक के प्रति हृदय से आभार व्‍यक्‍त करते हैं। 

*
जय जगदीश हरे 
प्रभु ! जय जगदीश हरे ! 
मायातीत, महेश्वर, 
मन-वच-बुद्धि परे ॥ जय
*
आदि, अनादि, अगोचर, 
अविचल, अविनाशी।
अतुल, अनंत, अनामय, 
अमित शक्ति-राशी ॥1॥ जय
*
अमल, अकल, अज, 
अक्षय, अव्यय, अविकारी ।
सत-चित-सुखमय, सुंदर, 
शिव, सत्ताधारी ॥2॥ जय
*
विधि, हरि, शंकर, गणपति, 
सूर्य, शक्तिरूपा ।
विश्व-चराचर तुमहीं, 
तुमहीं जग-भूपा ॥3॥ जय
*
माता-पिता-पितामह-
स्वामि-सुहृद-भर्ता ।
विश्वोत्पादक-पालक-
रक्षक-संहर्ता ।।4।। जय
*
साक्षी, शरण, सखा, प्रिय, 
प्रियतम, पूर्ण, प्रभो ।
केवल, काल, कलानिधि, 
कालातीत, विभो ॥5॥ जय
*
राम-कृष्ण, करुणामय, 
प्रेमामृत-सागर ।
मनमोहन, मुरलीधर, 
नित-नव, नटनागर ॥6॥ जय
*
सब विधि हीन, मलिनमति, 
हम अति पातकिजन ।
प्रभु-पद-विमुख अभागी, 
कलि-कलुषित तन-मन ॥7॥ जय
*
आश्रय-दान दयार्णव ! 
हम सबको दीजे ।
पाप-ताप हर हरि ! सब, 
निज-जन कर लीजे ॥ 8 ॥ जय
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जय जगदीश हरे | जगदीश्‍वर की आरती | Aarti Lyrics in Hindi and English

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Jai Jagdish Hare
Prabhu! Jai Jagdish Hare!
Mayateet, Maheshwar,
Man-Vach-Buddhi Pare ॥ Jai
*
Aadi, Anaadi, Agochar,
Avichal, Avinaashi.
Atul, Anant, Anamay,
Amit Shakti-Raashi ॥1॥ Jai
*
Amal, Akal, Aj,
Akshay, Avyay, Avikaari.
Sat-Chit-Sukhmay, Sundar,
Shiv, Sattadhaari ॥2॥ Jai
*
Vidhi, Hari, Shankar, Ganpati,
Surya, Shaktirupa.
Vishv-Charachar Tumheen,
Tumheen Jag-Bhoopa ॥3॥ Jai
*
Mata-Pita-Pitamah-
Swami-Suhrit-Bharta.
Vishvotpaadak-Paalak-
Rakshak-Sanharta ॥4॥ Jai
*
Saakshee, Sharan, Sakha, Priya,
Priyatam, Poorn, Prabho.
Keval, Kaal, Kalaanidhi,
Kaalateet, Vibho ॥5॥ Jai
*
Ram-Krishn, Karunamay,
Premamrit-Sagar.
Manmohan, Murlidhar,
Nit-Nav, Natnaagar ॥6॥ Jai
*
Sab Vidhi Heen, Malinmati,
Hum Ati Paatakijan.
Prabhu-Pad-Vimukh Abhaagi,
Kali-Kalushit Tan-Man ॥7॥ Jai
*
Aashray-Daan Dayaarṇav 
Hum Sabko Deeje.
Paap-Taap Har Hari! Sab,
Nij-Jan Kar Leeje ॥8॥ Jai
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मंगलवार, 30 सितंबर 2025

⚔️👁️ पौराणिक कथा – कौन था अन्धकासुर? | भगवान शिव और अन्धकासुर का युद्ध 🕉️🔥

कौन था अन्धकासुर | पौराणिक कथा प्रसंग
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दिति का एक महाबलशाली पुत्र अन्धक था । नेत्र रहते हुए भी वह मदान्ध होने के कारण अन्धों की तरह चलता था। इसी से उसका नाम अन्धक पड़ गया था । उसके आडि तथा वक दो पुत्र थे ।
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तपस्या के प्रभाव के कारण अन्धक देवताओं के लिए अबध्य हो गया था। एक बार जब अवन्ती के कालवन में महादेव पार्वती के साथ क्रीड़ा कर रहे थे, तब अन्धकासुर उन्मत्त-सा वहाँ पहुंचा और मॉं पार्वती का हरण करने की कोशिश करने लगा। तब क्रुद्ध हुए रुद्र तथा अन्धक में भीषण युद्ध हुआ और शङ्कर के पाशुपतास्त्र से घायल होने पर उसके रक्त से अनेक अन्धक उत्पन्न हो गए। रुद्र ने उन अन्धकों को बाणों से आहत कर दिया। किन्तु उन अन्धकों के रुधिर से पुनः सहस्रों अन्धक पैदा हो गये । उत्पन्न होते ही उन अन्धकों ने सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर लिया। तब उन मायावी अन्धकों के नाश के लिए रुद्र ने 197 मातृकाएँ उत्पन्न कीं, जिनमें माहेश्वरी, कौमारी, मालिनी, सौपर्णी, वायव्या आदि प्रमुख थीं । मातृकाओं ने उन अन्धकों का रुधिर पान करना प्रारम्भ किया; किन्तु वे पुनः बढ़ने लगे । तब खिन्न होकर शिव विष्णु की शरण में गए। तब उन्होंने 'शुष्क-रेवती' नामक एक मातृका को उत्पन्न किया। शुष्क रेवती ने क्षणभर में ही उन अन्धकों का रक्त, पी डाला और वे विनाश को प्राप्त हो गये । अन्धकों के नष्ट हो जाने पर अन्धक निराश हो गया। तब भगवान् शङ्कर ने शूलास्‍त्र से उस पर प्रहार किया; किन्तु अन्धक ने शङ्कर को प्रसन्‍न कर लिया और शिव-गणों का स्वामित्व प्राप्त किया।
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पौराणिक कथा – कौन था अन्धकासुर? | भगवान शिव और अन्धकासुर का युद्ध

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Diti ka ek Mahabalshaali putra Andhak tha. Netra rahte huye bhi vah madandh hone ke kaaran andhon ki tarah chalta tha. Isi se uska naam Andhak pad gaya tha. Uske Aadi tatha Vaka do putra the.
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Tapasya ke prabhav ke kaaran Andhak devtaon ke liye abadhya ho gaya tha. Ek baar jab Avanti ke Kalavan me Mahadev Parvati ke saath kreeda kar rahe the, tab Andhakasur unmatt-sa vahan pahuncha aur Maa Parvati ka haran karne ki koshish karne laga. Tab kruddh huye Rudra tatha Andhak me bhishan yudh hua aur Shankar ke Pashupatastra se ghaayal hone par uske rakt se anek Andhak utpann ho gaye. Rudra ne un Andhakon ko baanon se aahat kar diya. Kintu un Andhakon ke rudhir se punah sahasron Andhak paida ho gaye. Utpann hote hi un Andhakon ne sampoorn jagat ko vyapt kar liya. Tab un mayavi Andhakon ke naash ke liye Rudra ne 197 Maatrikaayen utpann ki, jinme Maheshwari, Kaumari, Malini, Sauparni, Vaivya adi pramukh thin. Maatrikaon ne un Andhakon ka rudhir paan karna praarambh kiya; kintu ve punah badhne lage. Tab khinn hokar Shiv Vishnu ki sharan me gaye. Tab unhone 'Shushk-Revati' naamak ek Maatrika ko utpann kiya. Shushk Revati ne kshanbhar me hi un Andhakon ka rakt pee daala aur ve vinaash ko praapt ho gaye. Andhakon ke nasht ho jaane par Andhak niraash ho gaya. Tab Bhagwan Shankar ne Shoolastra se us par prahaar kiya; kintu Andhak ne Shankar ko prasann kar liya aur Shiv-ganon ka swaamitva praapt kiya.
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आभार - यह कहानी श्री गौरीनाथ शास्‍त्री द्वारा सम्‍पादित पुस्‍तक पुराण कथा कोष अध्‍ययनमाला तृतीय-पुष्‍पम् से ली गयी है। पुस्‍तक का प्रकाशन 1983 में पौराणिक तथा वैदिक अध्‍ययन अनुसंधान संस्‍थान नैमिषारण्‍य सीतापुर के द्वारा किया गया है।  

शनिवार, 20 सितंबर 2025

जाहरवीर आरती | Goga Jaharveer ki Aarti | जाहर बीर गोगा जी की आरती

***
Goga Jaharveer ki Aarti
***
जय -जय जाहरवीर हरे
जय -जय गोगावीर हरे
धरती पर आकर के 
भक्तों के कष्ट हरे ||जय जय||
*
जो कोई भक्ति करे प्रेम से 
निसादिन करे प्रेम से 
भागे दुःख परे
*
विघ्न हरन  मंगल के दाता
जन -जन का कष्ट हरे
*
जेवर राव के पुत्र कहाए
रानी बाछल माता 
*
बागड़ में जन्म लिया गुगा ने 
सब जय -जयकार करे ||जय जय||
*
धर्म कि बेल बढाई निशदिन 
तपस्या रोज करे
*
दुष्ट जनों को दण्ड दिया
जग में रहे आप खरे ||जय -जय||
*
सत्य अहिंसा का व्रत धारा 
झूठ से सदा डरे
*
वचन भंग को बुरा समझ कर
घर से आप निकरे || जय-जय ||
*
माडी में करी तपस्या 
अचरज सभी करे
*
चारों दिशाओं  से भगत आ रहे 
जोड़े हाथ खड़े || जय-जय || 
*
अजर अमर है नाम तुम्हारा 
हे प्रसिद्ध जगत उजियारा
*
भूत  पिशाच निकट नहीं आवे 
जो कोई जाहर  नाम गावे || जय जय ||
*
सच्चे मन से जो ध्यान लगावे 
सुख सम्पति घर आवे 
*
नाम तुम्हारा जो कोई गावे 
जन्म जन्म के दुःख बिसरावे || जय-जय ||
*
भादो कृष्‍ण नोमी के दिन जो पूजे 
वह विघ्नों से नहीं डरे 
*
जय-जय जाहर वीर हरे
जय श्री गोगा वीर हरे
***
जाहरवीर आरती | Goga Jaharveer ki Aarti | जाहर बीर गोगा जी की आरती
***
Jai -Jai Jaharveer Hare
Jai -Jai Gogaveer Hare
*
Dharti par aakar ke
Bhakton ke kasht hare ||Jai Jai||
*
Jo koi bhakti kare prem se
Nisadin kare prem se
Bhaage dukh pare
*
Vighn haran mangal ke data
Jan -jan ka kasht hare
*
Jewar Rao ke putra kahaaye
Rani Bachhal mata
*
Bagad mein janm liya Guga ne
Sab jai -jaikaar kare ||Jai Jai||
*
Dharm ki bel badhaai nishdin
Tapasya roj kare
*
Dusht janon ko dand diya
Jag mein rahe aap khare ||Jai -Jai||
*
Satya ahinsa ka vrat dhara
Jhooth se sada dare
*
Vachan bhang ko bura samajh kar
Ghar se aap nikre || Jai-Jai ||
*
Madi mein kari tapasya
Acharaj sabhi kare
*
Charon dishaon se bhagat aa rahe
Jode haath khade || Jai-Jai ||
*
Ajar amar hai naam tumhara
He prasiddh jagat ujiyaara
*
Bhoot pishaach nikat nahin aave
Jo koi Jahar naam gaave || Jai Jai ||
*
Sachche man se jo dhyan lagave
Sukh sampati ghar aave
*
Naam tumhara jo koi gaave
Janm janm ke dukh bisraave || Jai-Jai ||
*
Bhado Krishn Nomi ke din jo pooje
Vah vighnon se nahin dare
*
Jai-Jai Jahar Veer Hare
Jai Shri Goga Veer Hare
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महाशिवरात्रि व्रत की प्रामाणिक और पौराणिक कथा : शिकारी चित्रभानु और शिवलिंग पूजन की अद्भुत गाथा

महाशिवरात्रि व्रत की प्रामाणिक और पौराणिक कथा
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महाशिवरात्रि व्रत की प्रामाणिक और पौराणिक कथा
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पूर्व काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी।
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शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा।
*
बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बिल्वपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची।
*
शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली- 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।'  शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया।
 *
कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया- 'हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। 
दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई। तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली- 'हे शिकारी! मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।' 
शिकारी हंसा और बोला- 'सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे।' उत्तर में हिरणी ने फिर कहा- जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करो, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं। हिरणी का दुखभरा स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। 
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पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला- ' हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।' मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा- 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' 
शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया। थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।
अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिवजी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जानकर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए।
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Poorv kaal mein Chitrabhanu naamak ek shikari tha. Jaanvaron ki hatya karke vah apne parivaar ko paalta tha. Vah ek sahookar ka karzdaar tha, lekin uska rin samay par na chuka saka. Krodhit sahookar ne shikari ko Shivmath mein bandi bana liya. Sanyog se us din Shivratri thi. Shikari dhyanmagn hokar Shiv-sambandhi dharmik baatein sunta raha. Chaturdashi ko usne Shivratri vrat ki katha bhi suni.
*
Shaam hote hi sahookar ne use apne paas bulaya aur rin chukane ke vishay mein baat ki. Shikari agle din saara rin lauta dene ka vachan dekar bandhan se chhoot gaya. Apni dincharya ki bhaanti vah jangal mein shikar ke liye nikla. Lekin dinbhar bandi grih mein rehne ke karan bhookh-pyaas se vyakul tha. Shikar khojta hua vah bahut door nikal gaya. Jab andhkaar ho gaya to usne vichaar kiya ki raat jangal mein hi bitani padegi. Vah van ek talab ke kinare ek bel ke ped par chadh kar raat bitane ka intezar karne laga.
*
Bilv vriksh ke neeche Shivling tha jo bilvpatron se dhanka hua tha. Shikari ko uska pata na chala. Padaav banate samay usne jo tahniyaan todi, ve sanyog se Shivling par girti chali gayi. Is prakar dinbhar bhookhe-pyaase shikari ka vrat bhi ho gaya aur Shivling par bilvpatra bhi chadh gaye. Ek pahar raat beet jaane par ek garbhini hirni talab par paani peene pahunchi.
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Shikari ne dhanush par teer chadhakar jyon hi pratyuncha kheenchhi, hirni boli- 'Main garbhini hoon. Sheeghr hi prasav karoongi. Tum ek saath do jeevon ki hatya karoge, jo theek nahin hai. Main bachche ko janm dekar sheeghr hi tumhare samaksh prastut ho jaaoongi, tab maar lena.' Shikari ne pratyuncha dheeli kar di aur hirni jangli jhaadiyon mein lupt ho gayi. Pratyuncha chadhane tatha dheeli karne ke vakt kuch bilv patra anayaas hi toot kar Shivling par gir gaye. Is prakar usse anjaane mein hi pratham prahar ka poojan bhi sampann ho gaya.
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Kuch hi der baad ek aur hirni udhar se nikli. Shikari ki prasannata ka thikaana na raha. Sameep aane par usne dhanush par baan chadhaya. Tab use dekh hirni ne vinamrataapoorvak nivedan kiya- 'He shikari! Main thodi der pehle ritu se nivritt hui hoon. Kaamatur virahini hoon. Apne priya ki khoj mein bhatak rahi hoon. Main apne pati se milkar sheeghr hi tumhare paas aa jaaoongi.' Shikari ne use bhi jaane diya.
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Do baar shikar ko khokar uska maatha thanka. Vah chinta mein pad gaya. Raatri ka aakhri pahar beet raha tha. Is baar bhi dhanush se lag kar kuch belpatra Shivling par ja gire tatha doosre prahar ki poojan bhi sampann ho gayi. Tabhi ek anya hirni apne bachchon ke saath udhar se nikli. Shikari ke liye yeh svarnim avsar tha. Usne dhanush par teer chadhane mein der nahin lagayi. Vah teer chhodne hi wala tha ki hirni boli- 'He shikari! Main in bachchon ko inke pita ke hawaale karke laut aaoongi. Is samay mujhe mat maaro.'
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Shikari hansa aur bola- 'Samne aaye shikar ko chhod doon, main aisa moorkh nahin. Isse pehle main do baar apna shikar kho chuka hoon. Mere bachche bhookh-pyaas se vyagra ho rahe honge.' Uttar mein hirni ne phir kaha- 'Jaise tumhein apne bachchon ki mamta sata rahi hai, theek vaise hi mujhe bhi. He shikari! Mera vishwas karo, main inhein inke pita ke paas chhodkar turant lautne ki pratigya karti hoon.' Hirni ka dukhbhara swar sunkar shikari ko us par daya aa gayi. Usne us mrigi ko bhi jaane diya. Shikar ke abhaav mein tatha bhookh-pyaas se vyakul shikari anjaane mein hi bel-vriksh par baitha belpatra tod-todkar neeche fekta ja raha tha.
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Pau fatne ko hui to ek hasht-pusht mrig usi raste par aaya. Shikari ne soch liya ki iska shikar vah avashya karega. Shikari ki tani pratyuncha dekhkar mrig vineet swar mein bola- 'He shikari! Yadi tumne mujhse poorv aane wali teen mrigiyon tatha chhote-chhote bachchon ko maar daala hai, to mujhe bhi maarne mein vilamb na karo, taaki mujhe unke viyog mein ek kshan bhi dukh na sehna pade. Main un hirniyon ka pati hoon. Yadi tumne unhein jeevandan diya hai to mujhe bhi kuch kshan ka jeevan dene ki kripa karo. Main unse milkar tumhare samaksh upasthit ho jaaoonga.' Mrig ki baat sunti hi shikari ke samne poori raat ka ghatnachakra ghoom gaya. Usne saari katha mrig ko suna di. Tab mrig ne kaha- 'Meri teenon patniyan jis prakar pratigyabaddh hokar gayi hain, meri mrityu se apne dharm ka paalan nahin kar paayengi. Atah jaise tumne unhein vishwaspatra maan kar chhoda hai, vaise hi mujhe bhi jaane do. Main un sabke saath tumhare samne sheeghr hi upasthit hota hoon.'
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Shikari ne use bhi jaane diya. Is prakar praat: ho aayi. Upvaas, raatri-jaagaran tatha Shivling par belpatra chadhne se anjaane mein hi par Shivratri ki pooja poorn ho gayi. Par anjaane mein hi ki hui poojan ka parinaam use tatkaal mila. Shikari ka hinsak hriday nirmal ho gaya. Usmein bhagavadshakti ka vaas ho gaya. Thodi hi der baad vah mrig saparivaar shikari ke samaksh upasthit ho gaya, taaki vah unka shikar kar sake, kintu jangli pashuon ki aisi satyata, saatvikta evam saamuhik prem-bhaavna dekhkar shikari ko badi glani hui. Usne mrig parivaar ko jeevandan de diya.
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Anjaane mein Shivratri ke vrat ka paalan karne par bhi shikari ko moksh ki praapti hui. Jab mrityu kaal mein Yamdoot uske jeev ko le jaane aaye to Shivganon ne unhein vaapas bhej diya tatha shikari ko Shivalok le gaye. Shivji ki kripa se hi apne is janm mein Raja Chitrabhanu apne pichhle janm ko yaad rakh paaye tatha Mahashivratri ke mahatva ko jaankar uska agle janm mein bhi paalan kar paaye.
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महाशिवरात्रि व्रत पर 10 प्रश्नोत्तर (FAQ)
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Q1. महाशिवरात्रि व्रत कब रखा जाता है?
👉 महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को रखा जाता है।
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Q2. महाशिवरात्रि व्रत का महत्व क्या है?
👉 इस व्रत से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है, पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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Q3. महाशिवरात्रि व्रत कौन रख सकता है?
👉 यह व्रत स्त्री, पुरुष, वृद्ध, युवा सभी रख सकते हैं। विशेष रूप से विवाहित स्त्रियां सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना से इसे करती हैं।
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Q4. महाशिवरात्रि व्रत कैसे किया जाता है?
👉 प्रातः स्नान कर संकल्प लें, दिनभर उपवास करें, रातभर जागरण करें और शिवलिंग का जलाभिषेक व पूजन करें।
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Q5. महाशिवरात्रि व्रत में क्या खाना चाहिए?
👉 व्रतधारी केवल फलाहार कर सकते हैं। फल, दूध, दही, फलाहारी पकवान और पानी का सेवन किया जाता है।
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Q6. क्या महाशिवरात्रि व्रत में नमक खा सकते हैं?
👉 व्रत में साधारण नमक नहीं खाया जाता, लेकिन सेंधा नमक का प्रयोग किया जा सकता है।
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Q7. शिवलिंग पर अभिषेक किससे करना चाहिए?
👉 शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद, घी, गंगाजल और बेलपत्र अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
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Q8. महाशिवरात्रि व्रत की पूजा का सही समय क्या है?
👉 पूजा का सर्वोत्तम समय निशीथ काल (आधी रात) माना जाता है। साथ ही चार प्रहरों में अलग-अलग पूजा भी की जाती है।
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Q9. क्या महाशिवरात्रि व्रत बिना उपवास किए रखा जा सकता है?
👉 हाँ, यदि स्वास्थ्य कारणों से उपवास संभव न हो तो केवल पूजा, जलाभिषेक और रात्रि-जागरण करके भी व्रत किया जा सकता है।
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Q10. महाशिवरात्रि व्रत करने से क्या फल मिलता है?
👉 इस व्रत से पापों का नाश होता है, संतान सुख की प्राप्ति होती है, वैवाहिक जीवन में खुशहाली आती है और अंततः मोक्ष प्राप्त होता है।
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